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मौलाना हसरत मोहानी वो शायर जिसकी रूह कहती है ‘हम कौल के हैं सादिक अगर जान भी जाती है, वल्लाह कभी खिदमत-ए-अंग्रेज न करते।’ ‘कुलियत-ए-हसरत‘ के नाम से प्रसिद्ध मौलाना हसरत मोहानी वही स्वतंत्रता सेनानी और शायर हैं, जिन्होंने ‘इंकलाब जिंदाबाद‘ का नारा दिया। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ वही नारा है जिसे भगत सिंह ने हमेशा के लिए अमर कर दिया। मौलाना हसरत मोहनी ने इस नारे को ऐसा गढ़ा, जो भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का मूलमंत्र बन गया। उनके जोशीले भाषणों के कारण उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया, लेकिन जेल की दीवारों ने उन्हें प्रेम, सौंदर्य और क्रांति पर उर्दू गजलें रचने से नहीं रोका। मादर-ए-वतन से बेपनाह मोहब्बत करने वाले मोहानी ने ‘चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद है’, जैसी मशहूर गजल जेल में लिख डाली।
अब तारूफ कराते हैं- मौलाना हसरत मोहानी उन्नाव (UP) जिले के मोहान कस्बे से ताल्लुक रखते हैं। उनका असली नाम सैयद फजल-उल-हसन था। हसरत उनका तखल्लुस यानी शायरी या गजल के लिए उपयोग किया जाने वाला एक उपनाम था। मोहान कस्बे में पैदाइश हुई, इसलिए उनके नाम में ‘मोहानी’ जुड़ गया।
स्कूल से इल्म पूरी करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। कॉलेज के दौरान ही वे कई आंदोलनों का हिस्सा बने जिसकी वजह से उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। यहां तक कि उन्हें कॉलेज से निष्कासित भी कर दिया गया, लेकिन इससे उनका आजादी का जुनून कम नहीं हुआ। वे देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ते रहे और कई बार जेल भी गए।
मोहानी ने ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’ एक मैगजीन निकाली जिसका इस्तेमाल उन्होंने आजादी के मकसद को आगे बढ़ाने के लिए किया। मोहानी अपनी पत्रिका के जरिये ब्रिटिश शासन के दमन और गलत नीतियों के खिलाफ लोगों को जागरूक कराते रहें, जिससे अंग्रेज नाराज हो गए और उन पर जुर्माना लगाया। जुर्माना न देने के कारण वह जेल गए। जेल से छूटने के बाद भी वे अंग्रेज़ों के खिलाफ लिखते रहे। मौलाना बड़ी बेबाकी से अपनी कलम के जरिए लोगों को आजादी की लड़ाई से रूबरू कराते रहे। अंग्रेज उनकी कलम की ताकत को समझ चुके थे। इसी डर से उनकी मैगजीन बंद करा दी गई, लेकिन अंग्रेज उनका हौसला नहीं तोड़ सके, वे लोगों के दिलों में आजादी की मशाल जलाते रहे।
वह भारतीय इतिहास के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने आजादी-ए-कामिल यानी ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ की मांग की थी। 1946 में जब संविधान सभा का गठन हुआ, तो बाबा साहब अंबेडकर के साथ मिलकर उन्होंने हिन्दुस्तान को संवारने के लिये मिलकर काम किया। मुल्क के बंटवारे की मुखालफत करने वाले मोहानी ने पाकिस्तान जाने की पेशकश ठुकरा दी। 13 मई 1951 को लखनऊ में उन्होंने आखिरी सांस ली। आजादी के वीर सिपाही हसरत मोहानी भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका बलिदान हर हिंदुस्तानी के दिल में सदियों तक लव जलाए रहेगा।
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